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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
मां वा निय़ुङ्क्ष्व सौहार्दाद्योत्स्ये भीष्मेण पाण्डव |  २८   क
त्वत्प्रय़ुक्तो ह्यहं राजन्किं न कुर्यां महाहवे ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति