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भीष्म पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
समासाद्य तु कौन्तेय़ो राज्ञस्तान्भीष्मरक्षिणः |  ४६   क
सुशर्माणमथो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति