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भीष्म पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
एवं सञ्जल्पतस्तस्य वीभत्सोः शत्रुघातिनः |  ४८   क
श्रुत्वापि परुषं वाक्यं सुशर्मा रथय़ूथपः |  ४८   ख
न चैनमव्रवीत्किञ्चिच्छुभं वा यदि वाशुभम् ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति