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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
आचार्यस्य च पाण्डूनां व्राह्मणस्य यशस्विनः |  १४   क
गोवृषो गौतमस्यासीत्कृपस्य सुपरिष्कृतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति