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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
स तेन भ्राजते राजन्गोवृषेण महारथः |  १५   क
त्रिपुरघ्नरथो यद्वद्गोवृषेण विराजते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति