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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय़ मारिष |  १९   क
सर्ववीजविरूढेव यथा सीता श्रिय़ा वृता ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति