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उद्योग पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
माद्रीसुतौ चापि रणाजिमध्ये; सर्वा दिशः सम्पतन्तौ स्मरन्ति |  ६   क
सेनां वर्षन्तौ शरवर्षैरजस्रं; महारथौ समरे दुष्प्रकम्प्यौ ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति