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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
तेषां तु रथमुह्यानां रथेषु विविधा ध्वजाः |  ३   क
प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र ज्वलिता इव पावकाः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति