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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
तथैव धनुराय़च्छत्पार्थः शत्रुविनाशनः |  ३१   क
गाण्डीवं दिव्यकर्मा तद्राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति