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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
अशोभत महावाहुर्गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः |  ३५   क
जिगीषुस्तान्नरव्याघ्राञ्जिघांसुश्च जय़द्रथम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति