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शान्ति पर्व
अध्याय ८१
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भीष्म उवाच
तं शक्त्या वर्धमानश्च सर्वतः परिवृंहय़ेत् |  १८   क
नित्यं क्षताद्वारय़ति यो धर्मेष्वपि कर्मसु ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति