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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
एकविंशश्च दश च कलाः सङ्ख्यानतः स्मृताः |  ११२   क
समग्रा यत्र वर्तन्ते तच्छरीरमिति स्मृतम् ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति