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अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
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श्रीरु उवाच
पुण्याः पवित्राः सुभगा ममादेशं प्रय़च्छत |  २१   क
वसेय़ं यत्र चाङ्गेऽहं तन्मे व्याख्यातुमर्हथ ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति