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अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
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श्रीरु उवाच
यांश्च द्विषाम्यहं गावस्ते विनश्यन्ति सर्वशः |  ८   क
धर्मार्थकामहीनाश्च ते भवन्त्यसुखान्विताः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति