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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते वै स्थावरं जङ्गमं च यत् |  १००   क
प्रनृत्तमुभय़ं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति