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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततः प्रनृत्तमासाद्य हर्षाविष्टेन चेतसा |  १०२   क
सुराणां हितकामार्थमृषिं देवोऽभ्यभाषत ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति