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वन पर्व
अध्याय ८१
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ऋषिरु उवाच
किं न पश्यसि मे देव कराच्छाकरसं स्रुतम् |  १०४   क
यं दृष्ट्वाहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महतान्वितः ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति