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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मय़ा |  ११०   क
त्वय़ि सर्वे च दृश्यन्ते सुरा व्रह्मादय़ोऽनघ ||  ११०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति