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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
न तेषां दुर्लभं किञ्चिदिह लोके परत्र च |  ११५   क
सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशय़ः ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति