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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् |  ११८   क
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ||  ११८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति