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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
अग्नितीर्थं ततो गच्छेत्तत्र स्नात्वा नरर्षभ |  ११९   क
अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||  ११९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति