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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
व्रह्मय़ोनिं समासाद्य शुचिः प्रय़तमानसः |  १२१   क
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र व्रह्मलोकं प्रपद्यते |  १२१   ख
पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशय़ः ||  १२१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति