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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् |  १२२   क
पृथूदकमिति ख्यातं कार्त्तिकेय़स्य वै नृप |  १२२   ख
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ||  १२२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति