अनुशासन पर्व  अध्याय ३

युधिष्ठिर उवाच

किमेतदिति तत्त्वेन प्रव्रूहि भरतर्षभ |  १७   क
देहान्तरमनासाद्य कथं स व्राह्मणोऽभवत् ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति