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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
क्रिय़ामन्त्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ |  १३५   क
चीर्णव्रतो भवेद्विप्रो दृष्टमेतत्पुरातने ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति