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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
उभय़ोर्हि नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् |  १३८   क
दानं वाप्युपवासो वा सहस्रगुणितं भवेत् ||  १३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति