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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र रेणुकातीर्थमुत्तमम् |  १३९   क
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः |  १३९   ख
स्रवपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् ||  १३९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति