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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततः पञ्चवटं गत्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  १४१   क
पुण्येन महता युक्तः सतां लोके महीय़ते ||  १४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति