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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वय़मेव वृषध्वजः |  १४२   क
तमर्चय़ित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति ||  १४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति