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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
औजसं वरुणं तीर्थं दीप्यते स्वेन तेजसा |  १४३   क
यत्र व्रह्मादिभिर्देवैरृषिभिश्च तपोधनैः |  १४३   ख
सेनापत्येन देवानामभिषिक्तो गुहस्तदा ||  १४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति