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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ वाराहं तीर्थमुत्तमम् |  १५   क
विष्णुर्वाराहरूपेण पूर्वं यत्र स्थितोऽभवत् |  १५   ख
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र अग्निष्टोमफलं लभेत् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति