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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततः स्थाणुवटं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |  १५५   क
तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुय़ात् ||  १५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति