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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
यत्र सारस्वतो राजन्सोऽङ्गिरास्तपसो निधिः |  १६४   क
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेय़फलं लभेत् |  १६४   ख
सारस्वतीं गतिं चैव लभते नात्र संशय़ः ||  १६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति