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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
संनिहित्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे |  १६७   क
अश्वमेधशतं तेन इष्टं भवति शाश्वतम् ||  १६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति