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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम |  १७२   क
तत्र स्नातस्तु धर्मज्ञ व्रह्मचारी समाहितः |  १७२   ख
राजसूय़ाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति शाश्वतम् ||  १७२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति