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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वाय़ुना समुदीरिताः |  १७४   क
अपि दुष्कृतकर्माणं नय़न्ति परमां गतिम् ||  १७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति