वन पर्व  अध्याय ८१

पुलस्त्य उवाच

कुरुक्षेत्रस्य तद्द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ |  २०   क
प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसेवी समाहितः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति