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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् |  ३७   क
स्नात्वा तीर्थवरे राजँल्लोकानुद्धरते स्वकान् |  ३७   ख
श्रीतीर्थं च समासाद्य विन्दते श्रिय़मुत्तमाम् ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति