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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
शङ्खिनीं तत्र आसाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह |  ४१   क
देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति