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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र द्वारपालमरन्तुकम् |  ४२   क
तस्य तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः |  ४२   ख
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति