वन पर्व  अध्याय ८१

पुलस्त्य उवाच

ततो गच्छेत धर्मज्ञ व्रह्मावर्तं नराधिप |  ४३   क
व्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा व्रह्मलोकमवाप्नुय़ात् ||  ४३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति