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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततोऽम्वुवश्यं धर्मज्ञ समासाद्य यथाक्रमम् |  ४६   क
कोशेश्वरस्य तीर्थेषु स्नात्वा भरतसत्तम |  ४६   ख
सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो व्रह्मलोके महीय़ते ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति