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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत |  ४७   क
प्रजा विवर्धते राजन्ननन्तां चाश्नुते श्रिय़म् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति