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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततः शीतवनं गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |  ४८   क
तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति