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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  ५४   क
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीय़ते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति