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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च दैवतानि पितॄंस्तथा |  ५७   क
उषित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति