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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र व्रह्मणः स्थानमुत्तमम् |  ५८   क
व्रह्मोदुम्वरमित्येव प्रकाशं भुवि भारत ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति