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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
कलश्यां चाप्युपस्पृश्य श्रद्दधानो जितेन्द्रिय़ः |  ६६   क
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति