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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
न सद्योऽरीन्विनिर्हन्याद्दृष्टस्य विजय़ोऽज्वरः |  १८   क
न यः शल्यं घट्टय़ति नवं च कुरुते व्रणम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति