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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् |  ७२   क
यत्र देवाः सदा राजन्फलकीवनमाश्रिताः |  ७२   ख
तपश्चरन्ति विपुलं वहुवर्षसहस्रकम् ||  ७२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति